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Monday, July 16, 2012

जिसकी तोहमतों को भी अपनाना था, निगाहें मुवस्सर न हुईं उनकी आख़िरी मुलाकात में

ख़ूबसूरती से चले आतें हैं वो कभी यूँ ही, पैमाने में हमारे सुबह-शाम धड़कते जज़्बात में 

वो उनका हमसे नजरें फिरा के चले जाना न कभी वापस आना, न ही हमसे कहीं दूर जाना

मसरूफ कर देता है वो उनका दोस्त कहना दिलासा देना, कहा था उन्होंने जो उस बरसात 

में

जिसकी तोहमतों को भी अपनाना था, निगाहें मुवस्सर न हुईं उनकी आख़िरी मुलाकात में
___उमेश सिंह

Thursday, May 24, 2012

थक गया हूँ गोद में लेकर सारे दर्द मिटा दे मेरे, माँ इस बार सुला दे मुझे

तेरे रोटियों की महक जहां भी रहूँ सताती है, हाथों से खुद फिर वो रोटियां खिला दे मुझे 

बरसातें सही तुने मेरे खातिर ठण्ड भी, लू के इन जलते थपेड़ों से बचा ले मुझे 

तुम हो समझती हो जो सब मेरे आंसूं न दिखे,तू आँचल में कुछ यूँ छिपा ले मुझे

गया मंदिर भी खुदा से पूछने गिरिज़ाघर गुरूद्वारे का पता सबने तेरा नाम लिया, माँ अपने चरणों से गंगा पिला दे मुझे

तू कहती थी कुछ और आँखें कहती थी तेरी, प्यार से डराने वाली आँखें फिर दिखा दे मुझे

थक गया हूँ गोद में लेकर सारे दर्द मिटा दे मेरे, माँ इस बार सुला दे मुझे____उमेश सिंह
खुद को भुलाया ख़ुदा को भी मुझमें जब तुम आये, इबादत की तरह मेरे सहर-शाम पर अब तुम छाए

जिक्र तक न करते हम अपनी मोहब्बत का, खुद तुमने ही कह दिया था जो हम कभी न कह पाए

यूँ ही सजा लेते हैं अरमान सज़ा देते हैं खुद को, तुमको दिल से पर हम कभी दफ़ा न कर पाए 

वफ़ाये नाम रहा हूँ ताउम्र रुसवाई मिली है, और देखो फिर तुम भी वफ़ा न कर पाए__उमेश सिंह

Saturday, March 31, 2012

FOUR LINES AGAIN


तहरीर जो दी थी तुमने मेरे इस दिल में आने की, रोक देना था मुझे उसी वक़्त तुम्हे कसम दे के जमाने की

ग़र कसम ही खाई थी तुमने नींदें चुराने की, यूँ ही ले जाते रूह हमारी क्या जरूरत थी मेरी धड़कनों पर ऍफ़आईआर कराने की

घुटन की सिलवटों  में खुद को बंद कर लिया कैदियों की तरह, तुम्हे क्या जरूरत थी फिर मेरी जमानत करवाने की

उम्मीद थी एक बार आसमान के नीचे तुमसे मिलने की, भला होगा सच ग़र तुम अर्जी दो मेरी सजाए उम्र क़ैद बढ़वाने की____उमेश सिंह

Wednesday, December 21, 2011

four lines again

क्यूँ मेरी हर सांस को अपना नाम बता गए हो, क्यूँ तुम मुझे इस वक़्त हर वक़्त अपना फ़रियादी बना गए हो

चलती हैं की रहगुजर न रहोगे अब तुम इस वक़्त, पता नहीं शायद इन्हें ये तुम हो जो मेरी मासूम रगों में समां

गए हो 

यूँ तो हर वक़्त फ़ना होती हैं तेरे नाम पर फ़ना करती हैं मेरे वक़्त को बेवक्त,क्यूँ इन्हें हर वक़्त के लिए अपना


बना गए हो


इजाज़त भी नहीं लेती हैं हमसे तुम्हारी इनायत को, कुछ यूँ तुम मुझे और मेरे जिन्दा दिल को जला गए हो


कुछ यूँ तुम तडपा गए हो_______उमेश सिंह

Monday, December 5, 2011

My Lines


तुम में ही सिमट के रह गए हैं हम ये कैसी खुद की रूह को मैंने सज़ा दी है

तेरे अहम की ख़ामोशी न टूटे न रूठे तेरा अहम कभी, इसलिए ख़ामोशी खुद की हमने बढ़ा दी है

अहमियत कुछ ज्यादा है तेरी मेरी नजरों में, तेरे लिए मैंने अपनी नजरों से झुकने की इल्तज़ा की है

न समझे हो मुझे न समझो ग़र मेरे प्यार को,समझना मैं था ही नहीं कभी, खुश रहो तुम तुम्हारे खुश रहने की

हमने हर पल दुआ की है______उमेश सिंह

Tuesday, November 8, 2011

MY LINES :)

ऐ ख़ुदा शिकायत है तुमसे मेरे लिए प्यार क्यूँ बनाया,क्या यही खुदाई है तुम्हारी मेरे दिल को प्यार हुआ पर 


उनके दिल में प्यार नहीं जगाया 

आओ तुम भी जमीं पर प्यार हो तुमको भी,दिल टूटे-तुम्हारा भी-रब रूठे, पूछुंगा क्यूँ दर्द हुआ अब तुमको 


तुम्हारे प्यार ने जब सताया

कितने बेरहम हो तुम और क्या प्यार करते हो हमसे,उनसे मिलाकर उम्मीदें दिल में जगाकर भी उनको हमारे 


लिए नहीं बनाया 

ऐ ख़ुदा शिकायत है तुमसे प्यार क्यूँ बनाया-प्यार क्यूँ बनाया, अब क्या मांगने आऊं तुम्हारे दरपे जितना दिया


है तुमने मैंने सब गंवाया_____उमेश सिंह