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Monday, December 5, 2011

My Lines


तुम में ही सिमट के रह गए हैं हम ये कैसी खुद की रूह को मैंने सज़ा दी है

तेरे अहम की ख़ामोशी न टूटे न रूठे तेरा अहम कभी, इसलिए ख़ामोशी खुद की हमने बढ़ा दी है

अहमियत कुछ ज्यादा है तेरी मेरी नजरों में, तेरे लिए मैंने अपनी नजरों से झुकने की इल्तज़ा की है

न समझे हो मुझे न समझो ग़र मेरे प्यार को,समझना मैं था ही नहीं कभी, खुश रहो तुम तुम्हारे खुश रहने की

हमने हर पल दुआ की है______उमेश सिंह

Tuesday, November 8, 2011

MY LINES :)

ऐ ख़ुदा शिकायत है तुमसे मेरे लिए प्यार क्यूँ बनाया,क्या यही खुदाई है तुम्हारी मेरे दिल को प्यार हुआ पर 


उनके दिल में प्यार नहीं जगाया 

आओ तुम भी जमीं पर प्यार हो तुमको भी,दिल टूटे-तुम्हारा भी-रब रूठे, पूछुंगा क्यूँ दर्द हुआ अब तुमको 


तुम्हारे प्यार ने जब सताया

कितने बेरहम हो तुम और क्या प्यार करते हो हमसे,उनसे मिलाकर उम्मीदें दिल में जगाकर भी उनको हमारे 


लिए नहीं बनाया 

ऐ ख़ुदा शिकायत है तुमसे प्यार क्यूँ बनाया-प्यार क्यूँ बनाया, अब क्या मांगने आऊं तुम्हारे दरपे जितना दिया


है तुमने मैंने सब गंवाया_____उमेश सिंह

Monday, September 26, 2011

समंदर बसा था

जितना तुमको बताना था चुप रहकर बता ले गए तुम



इन आँखों में समंदर बसा था और फिर इक-इक बूँद चुरा ले गए तुम


कितने ख़ूबसूरत थे तुम,हो तुम रहोगे भी पर वो ख़ूबसूरती छिपा ले गए तुम


आओगे कभी-नहीं आओगे,पता नहीं,अपने आने की वो आहट भी क्यूँ दबा ले गए तुम ..........उमेश सिंह

Sunday, August 7, 2011

my lines


क़ाश मुझे भी आईना दिखाना आ जाये, तुम्हारी बेरुखी को तुमसे मिलाना आ जाये 
हम जो हैं जैसे हैं रूह तुम्हारी हो चुकी, फ़रियाद इतनी है मुझे भी नजरें चुराना आ जाये
ख़ुदा रहम करो मेरे यार पर, ग़र वो अपना कहता है तो उसे अपनापन जताना आ जाये
दोस्त कहते हैं मुझे-तुम्हे रिश्ता निभाना नहीं आता शायद सच है खामोश हूँ आकर देखो मेरी झुकी नम आँखों को क्या सच है-सच क्या नहीं शायद तुम्हे भी रिश्ता निभाना आ जाये____उमेश सिंह  

Monday, July 25, 2011

MY LINES 4

जब से गुजरे हो तुम हमारे दिल की वीरान-तंग गलियों से इक आह छोड़ गए हो
 आ सकता हूँ जब भी तुम पुकारो पर तुम ही जाने क्यूँ, न आने की राह छोड़ गए हो 

आते हैं हर पल-दिन वो याद भी क्यूँ न आयें, तुम ऐसी ही दिल में एक सांस छोड़ गए हो

बता दो कब तक बिना तेरे यूँ रहूँगा नहीं पता,क्यूँ मरते हुए जीने की इक आस छोड़ गए हो...उमेश सिंह




Tuesday, July 12, 2011

my lines

मनाता है तुम्हे फिर रूठने को मजबूर करता है,प्यार तुम्हे बेहद ये दिल बेक़सूर करता है
क्या हुआ जो तुम नहीं समझते हमे न समझोगे, तुम्हे समझ कर ये दिल गरूर करता है
जानते है गुनाह करता है ये सच में, फिर भी हमे गुनाहगार बनने को मजबूर करता है
बूँद जो पानी से उठता है,गिरता है,गिरता है,फिर उसी आगोश में गिरने को दिल जरूर करता है
कुछ इसी तरह जुड़े हैं तुमसे हम,इसलिए मनाता है तुम्हे,रूठने को मजबूर करता है...उमेश सिंह